जंतर-मंतर : एनआईए जांच की मांग पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने नीट पेपर लीक के विरोध में जंतर मंतर पर छात्रों के जारी आंदोलन के बीच 20 जुलाई को आयोजित संसद चलो छात्र प्रदर्शन की राष्ट्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी मामले की जांच एनआए को सौंपने का निर्णय अदालत नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को करना होता है।

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 6 के तहत एनआईए जांच का निर्णय केंद्र सरकार की संतुष्टि के आधार पर लिया जाता है और अदालत उसकी जगह अपना मत नहीं दे सकती।

मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से कहा, “आपकी मांग एनआईए से जांच कराने की। यह तय करना संबंधित प्राधिकारियों का काम है कि किसी अपराध की जांच राज्य पुलिस करेगी या एनआईए, जहां तक एनआईए की बात है इस पर फैसला केंद्र सरकार को लेना है। हम केंद्र सरकार की संतुष्टि की जगह अपनी संतुष्टि नहीं रख सकते।”

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामला सार्वजनिक महत्व का है, इसलिए नोटिस जारी किया जाना चाहिए।

हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि यदि केंद्र सरकार उचित समझे तो वह कानून के तहत किसी भी मामले की जांच एनआईए को सौंप सकती है। इसके लिए पूरी कानूनी व्यवस्था पहले से मौजूद है।

बाद में याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली, जिसके बाद अदालत ने मामले का निस्तारण किया। याचिका अखिल भारत हिंदू महासभा के पूर्व उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल की ओर से दायर की गई।

इसमें दावा किया गया कि नीट पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ प्रदर्शन बाद में राजनीतिक आंदोलन का रूप ले गया और इसके पीछे विदेशी वित्तपोषित संगठनों तथा राजनीतिक तत्वों की साजिश हो सकती है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एनआईए कोई प्रारंभिक जांच एजेंसी नहीं बल्कि अनुसंधान एजेंसी है। अदालत ने कहा कि एनआईए की जांच शुरू होने से पहले एफआईआर दर्ज होना और राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने का प्रयास हुआ, पत्रकारों पर हमले हुए और पुलिसकर्मी घायल हुए। साथ ही दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का आरोप लगाते हुए अदालत से पुलिस से स्थिति रिपोर्ट मंगाने का आग्रह किया गया।

हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया, उनमें हाल ही में एफआईआर दर्ज हुई और कानून के तहत संबंधित एजेंसियां आवश्यक कार्रवाई करेंगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर वह किसी विशेष जांच एजेंसी को जांच सौंपने का निर्देश नहीं दे सकती। पीठ ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता अपनी शिकायत संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष रखता है, तो वे कानून के अनुसार उस पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके अलावा हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर कथित हमले, हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग वाली एक जनहित याचिका पर भी सुनवाई से इनकार किया और याचिकाकर्ता संस्था सेव इंडिया फाउंडेशन से कहा कि वह अपनी शिकायत संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष रखे।

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी व्यवस्था पहले से मौजूद है और संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार निर्णय लेने के लिए सक्षम हैं।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों में कार्रवाई के लिए स्पष्ट व्यवस्था तय की। आप संबंधित प्राधिकारियों के पास जाएं वे कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगे।” अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों को कोई अभ्यावेदन देता है तो उस पर कानून के अनुसार विचार कर उचित निर्णय लिया जाएगा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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